haldwani-shuddhikaran-vivadhaldwani-shuddhikaran-vivad

उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान से जोड़कर भाजपा पर निशाना साध रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगा रही है।

हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद से गरमाई उत्तराखंड की सियासत

हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित शुद्धिकरण को लेकर विवाद शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे दलित सम्मान और सामाजिक भेदभाव से जोड़कर सवाल उठाए। इसके बाद राहुल गांधी ने भी मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्रवाई की मांग की। विवाद उस समय और बढ़ गया जब राहुल गांधी के खिलाफ हल्द्वानी में FIR दर्ज होने की खबर सामने आई। पुलिस में दर्ज शिकायत में उन पर शुद्धिकरण मामले को जातिगत रंग देने और अनुसूचित वर्ग की भावनाओं को आहत करने के आरोप लगाए गए हैं।

2027 चुनाव से पहले दलित वोट क्यों अहम?

उत्तराखंड की राजनीति में दलित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए 13 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। हालांकि दलित वोट का प्रभाव केवल इन आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं माना जाता। हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों की कई सामान्य सीटों पर भी SC मतदाता चुनावी परिणामों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसी वजह से 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलित समाज से जुड़े किसी भी मुद्दे का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है।

2017 में BJP का दबदबा, 2022 में बदला समीकरण

उत्तराखंड की 13 SC आरक्षित सीटों पर पिछले दो विधानसभा चुनावों के आंकड़े भी दिलचस्प हैं। 2017 में भाजपा ने 13 में से 11 SC आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2022 में भाजपा की संख्या घटकर नौ रह गई, जबकि कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की। 2022 में कांग्रेस ने हरिद्वार की ज्वालापुर, भगवानपुर और झबरेड़ा सीटों के साथ ऊधमसिंह नगर की बाजपुर सीट भी जीती थी। इससे साफ है कि दलित वोट को किसी एक पार्टी का स्थायी वोट बैंक मानना आसान नहीं है।

हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में दलित वोट का असर

उत्तराखंड के मैदानी जिलों में जातीय और सामाजिक समीकरण ज्यादा विविध हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में मतदान प्रतिशत भी राज्य के औसत से अधिक रहा है। ऐसे में दलित मतदाताओं से जुड़े मुद्दे इन क्षेत्रों की कई विधानसभा सीटों के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।

कांग्रेस के लिए कितना बड़ा मौका?

कांग्रेस हल्द्वानी विवाद को दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के मुद्दे के रूप में आगे बढ़ा रही है। पार्टी के सामने अब चुनौती यह है कि इस मुद्दे को केवल भाजपा विरोध तक सीमित रखने के बजाय रोजगार, शिक्षा, आरक्षण, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे बड़े मुद्दों से जोड़ा जाए। अगर कांग्रेस ऐसा करने में सफल रहती है तो 2027 के चुनाव में मैदानी क्षेत्रों में उसे राजनीतिक फायदा मिल सकता है।

BJP के सामने भी चुनौती

भाजपा इस विवाद को कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति बता रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा दलित समाज के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव का समर्थन नहीं करती और कांग्रेस राजनीतिक लाभ के लिए मामले को तूल दे रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के उस नैरेटिव का जवाब देना है, जिसमें हल्द्वानी विवाद को दलित सम्मान और सामाजिक न्याय से जोड़ा जा रहा है।

राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा हल्द्वानी विवाद

हल्द्वानी का मामला अब उत्तराखंड की राजनीति से आगे राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 3 सितंबर को भाजपा नेता जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कथित शुद्धिकरण मामले में FIR दर्ज नहीं होने पर सवाल उठाए। खरगे ने कार्रवाई की मांग की।

वहीं राहुल गांधी ने भी इस मामले को लेकर भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा था और कार्रवाई की मांग की थी।

2024 के लोकसभा चुनाव ने भी दिए संकेत

दलित वोट के राष्ट्रीय राजनीतिक रुझान को देखें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में SC आरक्षित सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के प्रदर्शन में बदलाव देखने को मिला।भाजपा ने 84 SC आरक्षित सीटों में 30 पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस ने 20 सीटें जीतीं। 2019 में भाजपा ने 46 और कांग्रेस ने छह SC आरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी। इन आंकड़ों से यह संकेत जरूर मिलता है कि दलित वोट के लिए राजनीतिक मुकाबला पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हुआ है।

क्या हल्द्वानी विवाद वोट में बदल पाएगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद 2027 के विधानसभा चुनाव में वोट में बदल पाएगा? कांग्रेस के लिए यह मुद्दा राजनीतिक अवसर जरूर है, लेकिन इसे सीधे दलित वोट के एकमुश्त ध्रुवीकरण के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी। दूसरी तरफ भाजपा भी इस मुद्दे को कांग्रेस की वोट बैंक राजनीति बताकर नुकसान को सीमित करने की कोशिश कर रही है।

2027 में दलित वोट बनेगा बड़ा चुनावी फैक्टर?

उत्तराखंड में करीब 19 फीसदी दलित आबादी और 13 SC आरक्षित विधानसभा सीटों के चलते दलित मतदाता 2027 के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।हल्द्वानी विवाद इस बात की पहली बड़ी परीक्षा बन सकता है कि कांग्रेस दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के मुद्दे को कितना बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बना पाती है और भाजपा उसका मुकाबला किस तरह करती है। फिलहाल इतना तय है कि हल्द्वानी का विवाद सिर्फ एक स्थानीय राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है। 2027 के चुनाव से पहले यह उत्तराखंड में दलित वोट के बदलते सियासी समीकरण का अहम मुद्दा बन चुका है।