नेपाल में त्रिशूली नदी के उफान से हुई तबाही के बाद उत्तराखंड में नदी किनारे तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बाढ़ क्षेत्र में निर्माण को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उत्तराखंड में करीब 700 किमी नदियों की फ्लड प्लेन मैपिंग पूरी होकर नोटिफाई हो चुकी है, जबकि 1,175 किमी से अधिक हिस्से का सर्वे और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन पूरा हो चुका है और करीब 428 किमी पर अध्ययन अभी जारी है।
देहरादून: नेपाल में त्रिशूली नदी के किनारे बसे शहरों और बस्तियों में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी राज्यों के सामने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि नदियों के स्वाभाविक बाढ़ क्षेत्र में बढ़ता शहरी विस्तार किसी बड़े सैलाब की स्थिति में कितनी बड़ी तबाही का कारण बन सकता है। उत्तराखंड के लिए यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य के ज्यादातर बड़े शहर और कस्बे किसी न किसी नदी, गदेरे या बरसाती नाले के आसपास विकसित हुए हैं। पिछले कई दशकों में पहाड़ों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक नदी घाटियों में आबादी का विस्तार हुआ है और इसके साथ ही आवासीय, व्यावसायिक और सरकारी निर्माण भी लगातार बढ़े हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अगर नेपाल जैसी अथवा उससे कम तीव्रता की कोई असाधारण बाढ़ उत्तराखंड की नदियों में आती है तो उसकी चपेट में कितना क्षेत्र आएगा और क्या मौजूदा शहरी नियोजन उस खतरे को रोकने के लिए पर्याप्त है?
उत्तराखंड सिंचाई विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि राज्य में फ्लड प्लेन जोनिंग को लेकर एक बड़ा काम किया गया है। 27 अगस्त 2026 तक विभाग के अनुसार 697.60 किलोमीटर नदी क्षेत्र की फ्लड प्लेन डिमार्केशन पूरी हो चुकी है और इन क्षेत्रों की अंतिम अधिसूचना जारी की जा चुकी है। इनमें भागीरथी नदी का गंगोत्री से देवप्रयाग तक 133.35 किलोमीटर, गंगा का देवप्रयाग से ऋषिकेश तक 142 किलोमीटर, ऋषिकेश से चंडी पुल तक का हिस्सा, हरिद्वार में चंडी ब्रिज से लक्सर क्षेत्र के कालसिया गांव तक गंगा का हिस्सा, भिलंगना नदी के 68 किलोमीटर, अलकनंदा के बद्रीनाथ से देवप्रयाग तक 197.35 किलोमीटर, मंदाकिनी के केदारनाथ से रुद्रप्रयाग तक 76.90 किलोमीटर, आसन के 53 किलोमीटर और देहरादून की रिस्पना नदी के 27 किलोमीटर हिस्से को शामिल किया गया है। विभाग के दस्तावेज में इन सभी को अंतिम नोटिफिकेशन जारी हो चुके फ्लड प्लेन क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है।
यानी राज्य के पास अब केवल बाढ़ आने के बाद राहत और बचाव की व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि कई महत्वपूर्ण नदी क्षेत्रों के लिए पहले से यह वैज्ञानिक आधार मौजूद है कि संभावित बाढ़ का क्षेत्र कहां तक फैल सकता है। प्रमुख सचिव, सिंचाई आर मीनाक्षी सुंदरम के अनुसार उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जिसने इस दिशा में पहल करते हुए उत्तराखंड बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण अधिनियम, 2012 बनाया। इसी कानून के तहत नदियों के बाढ़ क्षेत्र को चिह्नित करने और उसे अधिसूचित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। उनके मुताबिक इस जोनिंग में पिछले 25 वर्ष और 100 वर्ष के भीतर आई बड़ी बाढ़ों के निशानों को आधार बनाकर बाढ़ क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं। इसके बाद प्रतिबंधित और विनियमित निर्माण से संबंधित कार्रवाई की जिम्मेदारी शहरी विकास विभाग के स्तर पर आती है। ऐसे में सिंचाई विभाग द्वारा सीमा तय किए जाने के बाद असली सवाल यह है कि इन सीमाओं के आधार पर शहरों में जमीन के इस्तेमाल और निर्माण को लेकर कितना बदलाव हुआ है।
700 किलोमीटर की मैपिंग पूरी, लेकिन काम अभी खत्म नहीं
फ्लड प्लेन जोनिंग का दायरा केवल उन 697.60 किलोमीटर तक सीमित नहीं है, जहां अंतिम अधिसूचना जारी हो चुकी है। सिंचाई विभाग के आंकड़ों के अनुसार 18 नदियों और नदी क्षेत्रों में कुल 1,175.54 किलोमीटर का सर्वे और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन पूरा हो चुका है। इनकी रिपोर्ट और फ्लड प्लेन जोन मैप तैयार हो चुके हैं तथा इन क्षेत्रों में प्रारंभिक अधिसूचना की प्रक्रिया चल रही है। इस सूची में सोलानी नदी के 70 किलोमीटर, गोला के 80 किलोमीटर, कोसी के 176 किलोमीटर, सुसवा के 24 किलोमीटर, झाकन/रानीपोखरी के 28 किलोमीटर, चंद्रभागा के 8 किलोमीटर, यमुना के 145 किलोमीटर, पिंडर के 106 किलोमीटर, धौलीगंगा के 87 किलोमीटर और नंदाकिनी के 36 किलोमीटर क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा मालिन, रातमऊ, नंधौर, लधिया, रामगंगा वेस्ट, सॉन्ग, बिंदाल तथा निमी-नून-सुवर्णा-सितला राव नदी क्षेत्रों को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया है।

इसका मतलब यह है कि अंतिम अधिसूचना जारी हो चुके करीब 698 किलोमीटर के अलावा 1,175.54 किलोमीटर का एक और बड़ा नदी क्षेत्र ऐसा है जहां वैज्ञानिक सर्वे और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन पूरा हो चुका है, लेकिन अंतिम अधिसूचना की प्रक्रिया अभी बाकी है। यानी इन इलाकों में मैपिंग का वैज्ञानिक आधार तैयार है, मगर उस आधार को कानूनी रूप से लागू करने की प्रक्रिया पूरी होना अभी बाकी है। यही वह चरण है जहां शहरी विकास और स्थानीय निकायों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

इसके अलावा करीब 428 किलोमीटर नदी क्षेत्र में अभी अध्ययन का काम चल रहा है। विभाग की तीसरी श्रेणी में शारदा/काली नदी के 244 किलोमीटर, ऋषिकेश के तपोवन स्थित डेक्कन वैली के पास प्राकृतिक ड्रेन/नाले के 4 किलोमीटर और नायर नदी के 180 किलोमीटर क्षेत्र को रखा गया है। शारदा/काली के लिए टेंडर पूरा हो चुका है लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति का इंतजार है, जबकि नायर नदी के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है और डेक्कन वैली क्षेत्र में अध्ययन जारी है।

इस तरह सिंचाई विभाग के उपलब्ध आंकड़ों को जोड़ें तो 697.60 किलोमीटर अंतिम रूप से अधिसूचित, 1,175.54 किलोमीटर सर्वे और हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन पूरा तथा 428 किलोमीटर अध्ययनाधीन है। यानी इन तीन श्रेणियों में कुल 2,301.14 किलोमीटर नदी क्षेत्र किसी न किसी स्तर पर फ्लड प्लेन जोनिंग की प्रक्रिया में शामिल है। हालांकि इन सभी 2,301 किलोमीटर को “नोटिफाइड फ्लड प्लेन” कहना सही नहीं होगा। फिलहाल अंतिम अधिसूचना वाला हिस्सा करीब 698 किलोमीटर है, जबकि बाकी हिस्से अलग-अलग प्रक्रिया चरण में हैं।
25 और 100 साल की बाढ़ का बेंचमार्क, लेकिन नेपाल जैसी आपदा नई चुनौती
प्रमुख सचिव सिंचाई आर मीनाक्षी सुंदरम का कहना है कि विभाग ने पिछले 25 और 100 वर्षों में आई बड़ी बाढ़ों के निशानों को बेंचमार्क के तौर पर चिह्नित किया है। यही निशान और उपलब्ध हाइड्रोलॉजिकल आंकड़े बाढ़ क्षेत्र तय करने का आधार बने हैं। लेकिन नेपाल में सामने आई अत्यधिक भीषण घटना ने इस पूरी व्यवस्था के सामने एक नया सवाल खड़ा किया है। सुंदरम के मुताबिक ऐसी विभीषिका का अनुमान सामान्य 100 साल की फ्लड मैपिंग के आधार पर लगाना संभव नहीं है। उनका कहना है कि नेपाल की घटना पिछले कई सदियों में सामने आने वाली दुर्लभ प्रकृति की घटना है और यह अपने आप में एक ऐतिहासिक बेंचमार्क है।
उनके अनुसार नेपाल की आपदा में केवल नदी में पानी बढ़ने का मामला नहीं था, बल्कि ग्लेशियर से आए मटेरियल और डैम में जमा पानी की भूमिका ने स्थिति को और अप्रत्याशित बनाया। इसी तरह उत्तराखंड में पिछले साल धराली क्षेत्र में खीरगाड़ नाले में आई आपदा ने भी यह दिखाया कि सूखे अथवा सामान्य दिखाई देने वाले नाले भी अचानक बेहद विनाशकारी जलधारा में बदल सकते हैं। ऐसी घटनाओं का पहले से सटीक अनुमान लगाना कठिन है। यही कारण है कि अब सवाल सिर्फ 25 या 100 साल की बाढ़ के मॉडल का नहीं, बल्कि extreme और unprecedented flood events के लिए शहरों की तैयारी का भी है।
108 शहरी निकायों में 30 फीसदी से ज्यादा नदी किनारे
सिंचाई विभाग द्वारा फ्लड प्लेन की सीमा तय करने के बाद अब निगाहें शहरी विकास विभाग पर हैं। उत्तराखंड में वर्तमान में 108 Urban Local Bodies यानी शहरी स्थानीय निकाय हैं और अपर निदेशक शहरी विकास प्रवीण कुमार के अनुसार इनमें 30 फीसदी से ज्यादा ऐसे निकाय हैं जो नदियों के किनारे मौजूद हैं। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य के शहरी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नदी आधारित आपदा के संभावित जोखिम से जुड़ा हुआ है।
शहरी विकास विभाग का कहना है कि आपदा प्रबंधन अब शहरी निकायों के लिए एक बड़ा विषय है और सभी Urban Local Bodies को पहले से Disaster Risk Assessment Plan के तहत अपने-अपने क्षेत्र का जोखिम आकलन करने और उसके आधार पर आपदा के दृष्टिकोण से प्लान तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। यानी शहरी निकायों को केवल सामान्य मास्टर प्लान या भवन निर्माण की अनुमति तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि अपने क्षेत्र में मौजूद आपदा जोखिम की पहचान भी करनी है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। राज्य में जहां सिंचाई विभाग ने करीब 698 किलोमीटर क्षेत्र की अंतिम फ्लड प्लेन मैपिंग कर दी है, वहीं इन मैपों के आधार पर शहरी क्षेत्रों में कितने निर्माण रोके गए, कितने भवनों की जांच हुई, कितने भवन अवैध घोषित हुए और कितने इलाकों में जमीन के इस्तेमाल में बदलाव किया गया—इन सवालों के जवाब अभी उतने स्पष्ट नहीं हैं।
देहरादून में रिस्पना पर कार्रवाई, बाकी शहरों में इंतजार
शहरी विकास विभाग के अपर निदेशक प्रवीण कुमार के मुताबिक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT के प्रकरण के तहत देहरादून में रिस्पना नदी की फ्लड प्लेन मैपिंग की गई है। इसी के आधार पर फ्लड जोन के अंतर्गत आने वाले सरकारी निर्माण को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन देहरादून के अलावा फिलहाल दूसरे किसी शहर में फ्लड प्लेन जोन को लेकर इसी तरह की कार्रवाई के निर्देश जारी नहीं हुए हैं।
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम सवाल भी है। जब सिंचाई विभाग के मुताबिक भागीरथी, गंगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, भिलंगना, आसन और रिस्पना समेत कई नदी क्षेत्रों की अंतिम फ्लड प्लेन अधिसूचना जारी हो चुकी है और दूसरी 18 नदियों की मैपिंग पूरी हो चुकी है, तो इन मैपों को शहरों की जमीन पर कैसे लागू किया जा रहा है?
शहरी विकास विभाग यह जरूर मानता है कि नदियों के किनारे, विशेष रूप से बाढ़ क्षेत्र में होने वाले निर्माण आपदा के दौरान ज्यादा जोखिम में होते हैं। विभाग के मुताबिक निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश लगातार जारी किए जाते हैं और प्रतिबंध के बावजूद होने वाला निर्माण अवैध निर्माण की श्रेणी में आता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन प्रतिबंधों की निगरानी उतनी ही प्रभावी है जितनी तेजी से नदी किनारे शहरों का विस्तार हो रहा है?
नदी की “सेफ लाइन” जमीन पर कहां है?
यही वह सवाल है जो नेपाल की घटना के बाद सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। क्या उत्तराखंड के नदी किनारे रहने वाले आम व्यक्ति को जमीन पर देखकर यह पता चल सकता है कि वह बाढ़ क्षेत्र के भीतर है या सुरक्षित क्षेत्र में? क्या हर नदी किनारे कोई ऐसा स्पष्ट बेंचमार्क, पिलर या साइन बोर्ड मौजूद है जो यह बताता हो कि पिछली बड़ी बाढ़ यहां तक पहुंची थी? और क्या उस निशान के आधार पर भविष्य के निर्माण को नियंत्रित किया जाता है?
वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट एमपीएस बिष्ट का कहना है कि पिछले लंबे समय में उत्तराखंड में शहरों का विस्तार नदी घाटियों की ओर हुआ है। पहाड़ के ऊपरी हिस्सों से लोग नीचे आए और नदी किनारे बसते गए। लेकिन नदी जब अपने उफान पर होती है तो वह अपने स्वाभाविक बाढ़ क्षेत्र में ही बहती है। इसलिए नदी के सामान्य दिनों के स्वरूप को देखकर उसके वास्तविक खतरे का अनुमान लगाना खतरनाक हो सकता है।
बिष्ट ने 1893-94 में गौणा ताल टूटने से आई भीषण आपदा का उदाहरण देते हुए बताया कि उस समय गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर तक तबाह हो गई थी। हरिद्वार के ऊपर गंगा कैनाल में भारी मात्रा में गाद भर गई थी, ऋषिकेश और हरिद्वार में भी गंभीर स्थिति बनी थी और चमोली शहर तक का अस्तित्व प्रभावित हुआ था। उनके मुताबिक इतिहास की इन बड़ी बाढ़ों को केवल पुराने दस्तावेजों में दर्ज रखने के बजाय आज के शहरों की प्लानिंग का हिस्सा बनाने की जरूरत है।
उनका सुझाव है कि बड़ी ऐतिहासिक बाढ़ों के बेंचमार्क को जमीन पर स्थापित किया जाना चाहिए। चूंकि उत्तराखंड में प्रमुख नदी घाटियों की संख्या सीमित है, इसलिए नदी किनारे बन रही सड़कों के साथ नियमित अंतराल पर ऐसे बेंचमार्क लगाए जा सकते हैं, ताकि लोगों को यह दिखाई दे कि अतीत में नदी का पानी किस स्तर तक पहुंच चुका है और भविष्य में नदी से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की जरूरत क्यों है।
1970 की अलकनंदा बाढ़ और 2013 की चेतावनी
एमपीएस बिष्ट ने 1970 में अलकनंदा में आई बड़ी बाढ़ का भी उदाहरण दिया। उनके मुताबिक उस समय उनके पिता ने श्रीनगर में अलकनंदा के किनारे SSB कैंप क्षेत्र में बड़ी बाढ़ का बेंचमार्क लगाया था। लेकिन बाद में उसी बेंचमार्क के नीचे करोड़ों रुपये की एक इमारत खड़ी कर दी गई। 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान जब अलकनंदा और दूसरी नदियों में जलस्तर और प्रवाह ने विकराल रूप लिया तो यह निर्माण भी बाढ़ की ताकत के सामने ज्यादा देर नहीं टिक पाया।
यह उदाहरण बताता है कि केवल बाढ़ का निशान बना देना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती उस निशान को शहरी नियोजन, भवन अनुमति और जमीन के इस्तेमाल के नियमों में लागू करने की है। यदि ऐतिहासिक बाढ़ का स्तर पता होने के बावजूद उसके नीचे निर्माण हो जाता है तो वैज्ञानिक अध्ययन और जमीन पर होने वाले निर्माण के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है।
नेपाल की घटना ने इसी दूरी को फिर से सामने ला दिया है। उत्तराखंड में अब चुनौती यह है कि 25 और 100 साल की ऐतिहासिक बाढ़ के आधार पर तैयार फ्लड प्लेन मैप को कितनी गंभीरता से शहरों के विस्तार पर लागू किया जाता है और क्या भविष्य की उन दुर्लभ घटनाओं के लिए भी अतिरिक्त सुरक्षा मानक तैयार किए जाएंगे जिन्हें पारंपरिक 100-year flood model में शामिल करना मुश्किल है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बाढ़ कहां तक आ सकती है। सवाल यह भी है कि हमने बाढ़ आने की स्थिति में वहां तक पहुंचने वाले पानी के रास्ते में क्या-क्या बना दिया है। उत्तराखंड में करीब 700 किलोमीटर नदी क्षेत्र का फ्लड प्लेन अंतिम रूप से चिन्हित होना निश्चित तौर पर एक बड़ी पहल है, लेकिन उसके बाद की असली परीक्षा शहरों और स्थानीय निकायों में शुरू होती है। 1,175.54 किलोमीटर क्षेत्र में अध्ययन पूरा होने और 428 किलोमीटर क्षेत्र में अध्ययन जारी रहने के बीच राज्य के सामने एक बड़ा अवसर भी है—ऐतिहासिक बाढ़ के निशानों, वैज्ञानिक मैपिंग और भविष्य के extreme flood scenarios को एक साथ रखकर यह तय करने का कि नदी और शहर के बीच आखिर सुरक्षित दूरी की वह रेखा कहां होनी चाहिए, जिसे किसी भी कीमत पर पार न किया जाए।

